:-यात्रा संस्मरण
अभी कुछ ही दिनों पहले मेरी धार्मिक एवं आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत मेरे गाँव से हुई। यह यात्रा गुरुदेव महंत दीपक पुरी जी महाराज के पावन निमंत्रण से प्रारंभ हुई, क्योंकि गुरुदेव ने विदेश की पावन धरती नेपाल के काठमांडू में भगवान पशुपतिनाथ मंदिर के चरणों में शिवकथा कराने का संकल्प लिया था। उसी कथा-श्रवण का संकल्प लेकर हम मित्रों के साथ यात्रा पर निकले।
यात्रा का पहला पड़ाव अपने गृह राज्य में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर था। मार्ग में होने के कारण हमने वहाँ पहुँचकर सच्चे मन से बालाजी महाराज के दर्शन किए। मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन के बाद हम पावन नगरी अयोध्या पहुँचे। वहाँ सबसे पहले हनुमानगढ़ी मंदिर जाकर भगवान हनुमानजी के सुंदर स्वरूप के दर्शन किए, जिससे मन को अद्भुत शांति का अनुभव हुआ।
इसके पश्चात हम भगवान प्रभु श्रीराम के भव्य एवं दिव्य मंदिर राम मंदिर अयोध्या पहुँचे। प्रभु श्रीराम के अलौकिक दर्शन से मन भाव-विभोर हो गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो जीवन का समस्त सुख एवं शांति मिल गई हो। अयोध्या की दिव्यता, रामदरबार की भव्यता और वहाँ का आध्यात्मिक वातावरण जीवन को धन्य कर गया। वर्षों की तपस्या के बाद प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि एवं दशरथ महल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
अयोध्या के दर्शन के बाद हम रक्सौल बॉर्डर के रास्ते नेपाल में प्रवेश किए। पूरी रात दुर्गम पहाड़ी मार्गों और ऊँचे पर्वतों के बीच यात्रा करते हुए प्रातःकाल अपने गंतव्य काठमांडू पहुँचे। वहाँ सबसे पहले बाबा पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन किए। दूसरे दिन महामंडलेश्वर श्री जगदीश पुरी महाराज की मधुर एवं रसमयी वाणी में शिवकथा का आनंद प्राप्त हुआ।
काठमांडू में अनेक दिव्य स्थलों के दर्शन का अवसर मिला। चन्द्रागिरि हिल्स पर भगवान भोलेनाथ के दर्शन एवं पूरे काठमांडू का मनोरम दृश्य देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त बूढ़ानीलकंठ मंदिर, बौद्धनाथ स्तूप, स्वयंभूनाथ स्तूप,नेपाल के प्रथम शक्ति पीठ गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, कमल पोखरी तथा भगवान केदारनाथ के शीश स्वरूप डोलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन प्राप्त हुए। कथा-विश्राम के बाद हमारी यात्रा माता जानकी की जन्मभूमि जनकपुर की ओर अग्रसर हुई।
विकट पहाड़ी रास्तों और नदियों को पार करते हुए हम जनकपुर पहुँचे। वहाँ बाणगंगा के दर्शन किए, जहाँ मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने माता सीता के लिए बाण से गंगा प्रकट की थी। इसके बाद भगवान श्रीराम एवं माता जानकी के विवाह स्थल के दर्शन किए। बाबा भूतनाथ, राजा जनक की कुलदेवी एवं भव्य जानकी महल के दर्शन से मन आनंदित हो उठा। वहीं उस ऐतिहासिक स्थान को देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ, जहाँ भगवान श्रीराम ने शिवधनुष भंग किया था। इन दिव्य स्थलों के दर्शन के साथ हमारी नेपाल यात्रा पूर्ण हुई। विदेश की धरती पर यह मेरी पहली आध्यात्मिक यात्रा थी, जो जीवनभर अविस्मरणीय रहेगी।
नेपाल से भारत लौटते हुए हमारी यात्रा वाराणसी पहुँची। वहाँ सबसे पहले अस्सी घाट पर गंगा स्नान किया। तत्पश्चात गंगा भ्रमण करते हुए बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन किए तथा काशी के कोतवाल काल भैरव मंदिर का आशीर्वाद प्राप्त किया।
इसके बाद हम बागेश्वर धाम की ओर रवाना हुए। मार्ग में ऊँची पहाड़ी पर स्थित प्राचीन स्वर्गेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन किए, जहाँ सचमुच स्वर्ग जैसा अनुभव हुआ। वहाँ से आगे बढ़कर बाबा बागेश्वर धाम में दर्शन किए तथा माता अन्नपूर्णा का प्रसाद ग्रहण किया।
वापसी में आदिशक्ति माँ जोगणिया के दर्शन करते हुए अंततः हमारी संपूर्ण यात्रा कोटड़ी श्याम मंदिर के चरणों में पूर्ण हुई। यह संपूर्ण यात्रा गुरुदेव की पावन कृपा एवं मेरे महादेव के आशीर्वाद से ही सफल हो सकी। महादेव की भक्ति का ही यह प्रतिफल था।
इस यात्रा ने जीवन को अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। भक्ति, आस्था और विश्वास पहले से कहीं अधिक दृढ़ हुए। इस यात्रा ने जीवन में वास्तविक आनंद का संचार किया। आध्यात्मिक चेतना और भक्ति-शक्ति का यह अनुभव सदैव मेरे जीवन का अमूल्य आधार रहेगा। इस संपूर्ण यात्रा में हर क्षण आनंद, शांति और दिव्य रस की अनुभूति प्राप्त हुई।
:-मोहित जागेटिया