नेपाल त्रासदी
पहाड़ टूटे, नदियाँ उफन गईं,
जल ने जब तांडव किया।
आई ईश्वर की त्रासदी जब,
इंसान की बनाई दुनिया भी उजड़ गई।
क्या अपना? क्या पराया?
किसी का पता नहीं,
सबको एक पल में समेट ले गई।
सपने टूटे, अपने छूट गए,
बचा जो जीवन किसी का,
सोच रहा है—जिए अब हम किसके लिए?
रोने के लिए अब कुछ नहीं,
खाने के लिए भी सब कुछ खो दिया।
देखा है हमने प्रकृति का ये प्रलय,
सोचने-समझने का एक पल भी न दिया।
तो क्यों हम कल की फ़िक्र में पड़े हैं?
जब वो तांडव करता है,
सब कुछ धरा का धरा रह जाता है।
न अपने, न पराए,
कोई काम नहीं आते हैं,
प्रकृति के इस तांडव के आगे
सब बेबस हो जाते हैं।
— मोहित जागेटिया