गुरुवार, 17 सितंबर 2020

कभी में गीत


कभी में गीत लिखता हूँ ,कभी में कविता सुनाता हूँ।।  
मिला जो दर्द का सागर ,उससे शब्दों में गाता हूँ।
मिलें कितने ही ये ज़ख्म खुद को घिरने नहीं दिया है
मगर सपने नहीं टूटे,उनको मैं रोज सजाता हूँ।।
मोहित जागेटिया

जन्मदिवस भाई


मेरे अनुज भ्राता VK Jagetiyaको और भतीजे ऋषि जागेटिया जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
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मेरे रिश्तों में तुम लगते हो अनुज भाई।
देता हूँ दिल से जन्मदिवस की मैं बधाई।
तुमने देखे जो हर ख़्वाब,हो पूरे सारे।
आज खुशियों के आंगन में गम सारे हारे।।
हो आपके हर सपनों के पंखों की उड़ान।
जीवन के हर रस्ते हो मुश्किल में आसान।।
आपकी खुशी की मैं करता हूँ ये इबादत।
हर पल मेरे ईश्वर आपको रखें सलामत।।
जन्मदिवस की आज ये वो शुभ बेला आई 
मंगलकामना करता और देता बधाई।
मोहित जागेटिया

शनिवार, 12 सितंबर 2020

हमसाया समझता है

कोई अपना समझता है कोई पराया समझता है ।
दिल की बेचैनी को तो बस कोई जाया समझता है ।
दर्द भरी इस ज़िंदगी को कोई ख़ुद नहीं समझ पाया ,
मगर दिलों के रिश्तों को कोई हमसाया समझता है ।।

-- मोहित जागेटिया

हिंदी दिवस पर


हिंदी दिवस पर...

हिंदी भाषा का ज्ञान लुटाते हैं ।
हिंदी की बिंदी को अपनाते हैं ।
ये हिंदी ही हमारी पहचान हो ,
इसलिए गीत हिंदी का गाते ह‌ैं । ।

हिंदी का करें हम भी सब सम्मान ।
बने हिंदी भारत की अमिट पहचान ।
हिंदी निज भाषा हो ये परिभाषा ,
हम सभी बोले हिंदी हिंदुस्तान ।।

देश धरा का मान दिया हिंदी ने ।
संस्कृति का ज्ञान दिया हिंदी ने ।
भारत के माथे की बिंदी हिंदी ,
शब्द सुमन का गान दिया हिंदी ने ।।

-- मोहित जागेटिया

तू शाम है

कभी अंधकार में चरागों से जलती तू शाम है ।
मेरी साँसों , मेरी धड़कन में तेरा ही नाम है ।
मेरे सपनों को सजाने के लिए अपना बना ले ,
मेरी मंज़िल मेरे सफ़र का तू ही तो मुकाम है ।।

-- मोहित जागेटिया

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

जल झुलनी पर


सुंदर शोभा श्याम की,सजा कोटड़ी धाम।
जन जन के आराध्य हो,दर्शन दो घनश्याम।।

हम दर्शन कैसे करें,बंद पड़ा दरबार।
कैसे आये कोटड़ी,घर से जय जयकार।।

लाखों भक्तों की सुनो,सुन लो तुम सरकार।
आज महामारी मिटा,दर्शन दो इसबार।।

आस्था का विश्वास है,आज कोटड़ी नाम।
ये धन्य धरा कोटड़ी,जहाँ बिराजे श्याम।।
मोहित जागेटिया

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

ये साँसे कुछ दिन की मेहमान है


ये साँसे कुछ दिनों की ही मेहमान है ।
ज़िंदगी इतनी थोड़ी न आसान है ?

जीना-मरना ये कुछ दिनों का है सफ़र ,
फिर भी जीवन करता कितना परेशान है ?

हौसलों के पंखों में सोच नई भरकर ,
आज मंज़िल के सफ़र की ये उड़ान है ।

कब सुबह कब शाम रोज रात है आती ,
अंधेरी रातों में भी कुछ मुस्कान है ।

ग़म भी हार गया छोड़ दी जब ज़िंदगी ,
किया क्या जिंदगी ने वही तो पहचान है ।

-- मोहित जागेटिया